Swami Vivekananda Biography in Hindi

Swami Vivekananda Biography in Hindi | स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय | Swami Vivekananda No 1 biography pdf download

Swami Vivekananda Biography in Hindi | स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय। में आपको बायोग्राफी, शिक्षा, रामकृष्ण से भेंट, विवेकानंद का वैराग्य जीवन, अमेरिका यात्रा और शिकागो भाषन, पश्चिमी यात्रा के दौरान वेदान्त मठ की स्थापना करना फिर भारत को वापसी और अपना मठ का उत्तराधिकारी नियुकत कर महासमाधि में लिन ।

Book Review

“विश्वगुरु विवेकानंद”  फिंगरप्रिंट प्रकाशक द्वारा प्रकाशित किया गया एक शानदार किताब! जिसके लेखक एम. आई. राजस्वी हैं। वैसे स्वामी विवेकानंद की बायोग्राफी तो बहुत सारे लेखकों द्वारा लिखी लिखी गई हैं लेकिन राजस्वी द्वारा लिखा गया इस किताब की खासियत ये है कि इसमें विश्वगुरु विवेकानंद की जीवन परिचय, प्रमुख यात्राएं, शिकांगों सहित चुनिंदा कुछ प्रमुख व्याख्यानों साथ-साथ अपने शिष्यों को लिखा गया पत्र और उनके मन-मस्तिष्क से उपजी, भावना रहित कुछ कविताएं भी शामिल हैं।  

मैने अपने पिछले ब्लॉग पोस्ट में एलन मस्क को पश्चिम का सूरज कहा था, अगर मैं विश्वगुरु स्वामी विवेकानंद को पूरब का सूरज कहूँ तो मुझे नहीं लगता कोई अतिशयोक्ति होंगी। जिसका जन्म सिर्फ और सिर्फ इसी उद्देश्य से हुआ कि आप ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को, खास कर पश्चिम के लोगों को( जिनका मन-मस्तिष्क अपनी छोली फैलाए, ज्ञान के लिए पूरब के तरफ आस लगाए बैठा है) उनके जीवन के मार्गदर्शन कर उचित दिशा दिखाए।

एक तरफ भारत पश्चिमी सभ्यता के पैरों तले रौंदा जा रहा था तो वही स्वामि विवेकानंद पश्चिम के लोगों का मार्गदर्शन कर उनकों सही दिशा में सही रास्ते पर लाने का काम कर रहे थे। भारत का परिचय दे रहे थे। ज्ञान की गंगा को उनकी छोटी सी झोली में उड़ेलते जा रहे थे। जिसके जवाब के सामने बड़े से बड़ा धर्म का ज्ञाता तनिक भी टिक नहीं पाता था।  

किसी धर्म गुरु ने कह दिया कि किसी भी धर्म के लोगों की तुलना में ईसाई धर्म के लोग आर्थिक रूप से बहुत मजबूत होते हैं। तब स्वामी विवेकानंद ने तुरंत जवाब दिया कि हाँ, सनातनियों को लूट कर। जो अभी भी जारी है। उस महापुरुष की जुबान पर एक भारी-भरकम ताला लग गया और महापुरुष तुरंत वहाँ से रफूचक्कर हो गए। तो ऐसे थे हमारे स्वामी विवेकानंद।

विश्वगुरु विवेकानंद एकमात्र ऐसे संत रहे हैं जिनके द्वारा स्थापित संघ आज भी निर्विवाद रूप से जन-कल्याण के व्रत का निर्वाह कर रहा है। यह पुस्तक ‘विश्वगुरु विवेकानंद’ ऐसे ही लघु मानव से महामानव और सामान्य सन्यासी से महासन्यासी बनने वाले विलक्षण व्यक्तित्व के दर्शन कराती है।   

Swami Vivekananda Biography in Hindi

प्रारम्भिक जीवन-

नेन्द्रनाथ दत्त का जन्म 12 जनवरी 1863 को सुबह 6 बजकर 33 मिनट पर हुआ था। जिसके बाद माता भुनेश्वरी देवी और पिता विश्वनाथ दत्त खुशी से फुले नहीं समा रहे थे। तिजोरी में पड़े खजाने पिता द्वारा दास-दसियों को दोनों हाथों से लुटाए जाने जाने लगे। मुहल्लों में नगाड़ों की आवाज गुजने लगी। बधाइयों की बरसात हो गई।। जो कोई भी दरवाजे पर आता इस शुभ घटना से अपने को आनंदित होने से नहीं रोक पाता और विश्वनाथ दत्त उन सबका मुख मीठा कराए बिना नहीं जाने देते थे।

भुनेश्वरी के अराध्य शंकर जी के आशीर्वाद से जन्मे इस तेज को एक नाम दिया गया और विश्वनाथ दत्त विशेश्वर से ‘बिले’ पुकारने लगे। अन्नप्रास संस्कार के दौरान नाम रखने पर बिले ‘नरेन्द्रनाथ दत्त’ हो गए। नरेंद्र की बुध्दि प्रखर और तेज थी। आँख के सामने घटे हर एक घटना का बड़े ही उत्सुक देखते और चपलता से पिता से सवाल करते थे, जिसे पिता द्वारा जवाब नहीं दिए जाने पर उन्हे माता के पास भेज दिया जाता था।

रामकृष्ण से मुलाकात-

नरेंद्र की बढ़ती उम्र के साथ-साथ उनके जीवन में शिक्षा के मानक भी बढ़ते गए। एक दिन वह भी आया जब नरेंद्र को अपने गुरु से भेंट हुई। हुआ यू कि नरेंद्र अपने सखा सुरेन्द्रनाथ घोष के घर एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में पहुचे हुए थे। अपनी माता के साथ भजन-कीर्तन में लगने के कारण नरेंद्र को भी भजन आते थे। सखा के कहने पर नरेंद्र ने बड़े ही विनम्रता से भजन सुनाया और जिस पर सबसे ज़्यादा प्रभाव पड़ा वो थे रामकृष्ण परमहंस।

नरेंद्र की मुलाकात गुरु से बहुत अद्भुत हुई। गुरुदेव अपने शिष्य के आभा को जान गए और ऐसे मंतमुग्ध हो गए जैसे उन्हे भगवान के दर्शन हुए हो। ये बात नरेंद्र को नहीं पची। उनका मानना था कि शिष्य की तलास गुरु को होती है नाकि गुरु को शिष्य की। गुरु ने कुछ नहीं कहा और मुसकुराते रहे। अपने निवास स्थान दक्षिणेश्वर आने का निमंत्रण देकर चलते बने।

एक दिन गुरुदेव नरेंद्र की तलास में पूजा-पाठ वाली जगह को पहुचे, जहां नरेंद्र पहले से ही मौजूद थे। उन सभी लोगों में से किसी ने भी गुरु के तरफ ध्यान नहीं दिया, नरेंद्र को यह अच्छा नहीं लगा, चुकी नरेंद्र गुरुदेव की शक्ति-ज्ञान से भली-भांति परिचित थे, अतः जब उनसे नहीं रहा गया तब हॉल की मेन लाइट काट कर गुरुदेव का हाथ पकड़ कर बाहर ले गए और गुरु के कहने पर दक्षिणेश्वर आने का वादा किया। 

अगले दिन जब उनकी मुलाकात गुरु से उनके स्थान पर हुई तो मिलते ही नरेंद्र ने गुरु से पूछा की क्या आपने भगवान को देखा है? गुरु ने हाँ में जवाब दिया। और नरेंद्र के कहने पर अपने स्पर्श मात्र से गुरु ने छटा दिखाई, जिसके बाद नरेंद्र बदल गए। और अपने को आकाशगंगा में उपस्थित उन सप्त ॠषियों के गण की तरह देखने लगे।

पिता की मृत्यु और वैराग्य-

1884 से पिता की मृत्यु ने ठहरे पानी में ज्वार पैदा कर दी। ये समय ऐसा था कि नरेंद्र का जीवन बहुत उथल-पुथल हो गया। पिता द्वारा धन को इस प्रकार लुटाया गया कि घर में खाने को लाले पड़ गए। नरेंद्र ने अपने गुरु से इसकी उपाय मांगी। गुरु ने मंदिर में उपस्थित अपनी इष्ट देवी काली माँ से वो सारी चीजे मागने को कहा। लेकिन जब भी नरेंद्र मूर्ति के समक्ष जाते। धन-दौलत के जगह विद्या और वैराग्य मांग आते। ये गुरु जान कर बहुत प्रसन्न हुए आशीर्वाद दिया कि वो सभी चीजे मिलगे, जो जरूरत है। नरेंद्र ने गुरु के आशीर्वाद को ग्रहण किया।

धीरे-धीरे घर की स्थिति ठीक होने लगी और नरेंद्र की आस्था अपने गुरु में उतनी ही तेजी से बढ़ने लगा। गुरु से शिक्षा ग्रहण करने के बाद शहर में घूम-घूम कर भिक्षा मांगने की बारी आई, जिसमें नरेंद्र सबसे आगे थे। परीक्षा पूर्ण होने पर नरेंद्र और और गुरु भाइयों की भांति उन्हे भी एक नया नाम मिला स्वामी विदिशानन्द ।

विदिशानन्द और मठ का उत्तरदाईत्व-

15 अगस्त, 1886 को परमहंस रामकृष्ण अपनी सारी बागडोर स्वामी विदिशानन्द के हाथों में सौप कर हमेशा के लिए महासमाधी में लिन हो गए। स्वामी विदिशनन्द अपना उत्तरदाईत्व समझते हुए ईमानदारी से गुरु के कार्यभार को संभाला और मठ चलने लगा। अपना मठ संभालने के बाद स्वामी विदिशानन्द भारत भ्रमण पर निकले और एक से एक संतों से मिलते हुए हर उस राज्य के राजा के दरबार को अपना ज्ञान की गंगा से पवित्र किया, जिसमें राजस्थान, लखनऊ, महाराष्ट्र, गुजरात, मद्रास के निजाम भी शामिल हैं।

इसी दौरान उन्हे ज्ञात हुआ कि पश्चिम में एक सर्व धर्म सम्मेलन होने वाला है। स्वामी विदिशानन्द अपने गुरु रामकृष्ण और गुरुमाता के मार्गदर्शन पर अमेरिका जाने की घोषणा की। लेकिन जाने के लिए उनके पास पर्याप्त पैसा नहीं था। स्वामी जी मदद के लिए बहुत सारे रईसों का दरवाजा खुला वो भी भरे दिल से लेकिन स्वामी जी स्वीकार नहीं किया क्योंकि इस धर्म कार्य के लिए ये उचित नहीं था कि वो पैसे गरीबों से लुटा गया हो।

खेतड़ी के राजा से मुलाकात-

स्वामी जी ने जनता से ही चंदा रूपी पैसा इकट्ठा करना शुरू किया। 10 फरवरी, 1892 को स्वामी हैदराबाद पहुचे तो लोगों ने उनका खूब स्वागत किया। वहाँ के निजाम ने बहुत खूब सेवा-स्वागत किया। और जब उन्हे भी स्वामी जी के जाने का पता चला तो उन्हे भी धन की पेशकश की लेकिन स्वामी जी ने खुशी-खुशी मना कर दिया ।

कुछ दिनों बाद खेतड़ी के राजा अजित सिंह मद्रास घूमने आए थे। स्वामी जी के मुलाकात से वो बड़े प्रभावित हुए क्योंकि स्वामी जी के ही आशीर्वाद से उन्हे पुत्र की प्राप्ति हुई थी। स्वामी जी ओज से प्रभावित होकर उन्होंने एक नया नाम दिया। स्वामी विवेकानन्द। और महाराजा अजित सिंह ने पुत्र-प्राप्ति के भेट स्वरूप विवेकानन्द को अपने दीवान जगमोहन लाल के साथ  ढेर सारा पैसा और अमेरिका की टिकट के साथ मुंबई बंदरगाह को रवाना कर दिया।

31 मई, 1899 को बंबई बंदरगाह से भारतीय वेदान्त की ध्वजा लेकर स्वामी विवेकानन्द करोड़ों भारतीयों की आशाओं के साथ पनिन्सुलर स्टीमर में चढ़े तो उनके शुभचिंतकों और शिष्यों ने हर्षध्वनि के साथ उन्हे विदाई दी। स्वामी जी सिंगापूर, जापान, कनाडा होते हुए बैंकुवर के रेल मार्ग से अमेरिका पहुचे।

शिकागों में प्रवेश-

विवेकानंद ने अमेरिका के शहरों में कुछ दिन बिताया और अपने ज्ञान का प्रकाश वहाँ की गलियों मे फैलाते चले। जिनमें बहुत सारे अमेरिकी उनके शिष्य बनते गए। उन्ही शिष्यों में खास थे, मिस्टर राइट। विवेकानंद ने मिस्टर राइट को अपने अमेरिका आने का उद्देश्य बताया और जब उसका समय आ गया तो मिस्टर राइट ने शिकागो की टिकेत के साथ रेल में बैठा दिया। 9 सितंबर, 1893 को शिकागो पहुचे। 

मिस्टर राइट द्वारा दिया गया पता कहीं गुम हो गया। और स्वामी जी सड़कों पर भटकने लगे। तब एक फरिस्ता बन कर श्री माती जॉर्ज डब्ल्यू. हेल ने स्वामी जी के तरफ मदद का हाथ बताया और उन्हे पाने घर ले गई। स्वामी जी से सारा वाकया सुनने के बाद हेल ने बताया कि उनके पति उस सम्मेलन में हिस्सेदार है। जिसे जानकार स्वामी जी बहुत खुश हुए और मिस्टर हेल ने उस धर्म सम्मेलन के अध्यक्ष से मिलाया।

शिकागों में भाषण-

11 सितंबर, 1893 को अमेरिका के साथ-साथ भारत भी इस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहा था। स्वामी जी थोड़े घबराए हुए थे। क्योंकि उनके जितने भी प्रतिद्वंदी थे, उनके पास अपना बनाया हुआ नोट्स था और सवामी जी खाली हाथ। भाषण देना आरंभ हुआ। एक के बाद एक धर्म अधिकारी देते चले गए। जब भी स्वामी जी का नंबर आटा वो टाल देते और दूसरे को भेजने के लिए कहते। आखिर वो भी समय आ गया जब मंच से स्वामी जी का नाम पुकारा गया।

स्वामी जी मंच पर पहुचे और थोड़ा-बहुत इधर-उधर देखने के बाद अपने वाक्य को कहना प्रारंभ किया…

“सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका…!” बस फिर क्या था, श्रोतागण के कानों में अभी इतने ही वाक्य पहुचे कि सभी खुशी और उन्माद से चिल्लाने लगे और सात मिनट तक पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँजता रहा।

स्वामी जी को थोड़ा उत्साह मिला और स्वामी जी निरंतर उन्माद के साथ बोलते रहे। जब तक स्वामी जी अपनी जुबान को विराम देते, पूरा हॉल और लगभग सभी धर्म-अधिकारी भी मंत्रमुग्ध हो चुके थे। अगली सुबह अमेरिका के चारों ओर सिर्फ और सिर्फ स्वामी जी की ही गूंज थी। सारे लोग स्वामी जी से मिलने को मतवाले हो गए। और विपक्ष हो गया अपने ही देश से आए हुए कुछ धर्म अधिकारी। और यहाँ के उपस्थित ईसाई वर्ग के पोप।

भिन्न देशों की यात्रा-

न्यूयार्क, पेरिस और लंदन में एक के बाद एक भाषण देने के बाद वहाँ के लोगों में हिन्दू धर्म को स्थापित कर, हिन्दू धर्म के दीपक को जला कर भारत को रवाना हो गए। श्री लंका होते हुए मद्रास पहुचे। लाखों भारतीय उनकी स्वागत को फूल-माला लिए खड़े रहे। और लोगों के अभिवादन को स्वीकार कर चेन्नई में एक भाषण दिया और फिर कोलकाता को लौट आए।

भारत वापसी-

कलकत्ता मे अपने घर-बार और शिष्यों से मिलने बाद 1, मई, 1897 को रामकृष्ण मिशन की स्थापना की गई। और अपने शिष्यों के साथ लोगों को जागृत करते हुए उत्तर भारत और फिर कलकत्ता को वापसी कर ली। मायावती में अद्वैत आश्रम की स्थापना कर दूसरी बार पश्चिम देशों की यात्रा पर निकल पड़े और न्यूयार्क को प्रस्थान किया।

स्वामी विवेकानंद यही नहीं रुके, सैन फ्रांसिस्को में वेदान्त समिति की भी सथापना किया। जिससे वहाँ के लोगों को जोड़ कर सही मार्ग दिखाया जा सके और उन्हे अंधेरे से प्रकाश की ओर लाया जा सके। न्यूयॉर्क में अंतिम कक्षा के बाद यूरोप को रवाना हुए। जिसमें वियना, हंगरी, ग्रीस, मिश्र, आदि देशों की यात्रा की। फिर भारत में 26 नवंबर, 1900 को वापसी किया।

महासमाधि में लिन-

10 जनवरी, 1901 को मायावती की यात्रा करने के बाद पूर्वी बंगाल और असम की यात्रा की। फिर उत्तर भारत में बोधगया और वाराणसी की यात्रा कर बैलूर मठ को वापस आए और कुछ दिन गुजारने के बाद विवेकानंद अपना कार्यभार अपने सबसे चहेते शिष्य प्रेमानन्द को मठ का उत्तराधिकारी बना कर  4 जुलाई, 1902 को महा समाधि में लिन हो गए।

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शिकांगों में दिया गया भाषण-

अमेरिकावासी बहनों और भाइयों!

आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया है, उसके लिए प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से परिपूर्ण हो रहा है। संसार में सन्यासियों की सबसे प्राचीन परंपरा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ, धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ और सभी संप्रदायों एवं मतों के कोटी-कोटी हिंदुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूँ।

मैं इस मंच से बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ, जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय यह बताया है कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रसारित करने के गौरव का दावा कर सकते  हैं। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने का अनुभव करता हूँ, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति-दोनों की ही शिक्षा दी है। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वाश नहीं करते, वरन समस्त धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार करते हैं।

मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभीमान है, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों तथा शरणार्थियों को आश्रय प्रदान किया है। मुझे आपको यह बताते हुए गर्व का अनुभव होता है कि हमने अपने वक्ष में यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट अंश को स्थान दिया था, जिन्होंने दक्षिण भारत में आकर उसी वर्ष शरण ली थी, जिस वर्ष उनका पवित्र मंदिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल धूसित कर दिया गया था।

ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूँ, जिसने महान जरथुस्त्रा जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है।

भाइयों, मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंकियाँ सुनाता हूँ, जिसकी आवृति मैं अपने वचन से कर रहा हूँ और जिसकी आवृति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं-

रुचिनां वैचित्र्य दृजुकुटिलनानापथजूषाम|

नृणामेको गम्यस्टवमसि पयसामर्णव इव||

अर्थात हे प्रभो! विभिन्न नदियां जिस प्रकार भिन्न-भिन्न स्त्रोतों से निकलकर समुद्र में समाहित हो जाती हैं, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जाने वाले लोग अंत में तुझमें ही आकार मिल जाते हैं।          

सांप्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्माधता इस सुनदार  पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी है। ये पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी है। ये पृथ्वी को हिंसा से भारती रही है, बारम्बार मानवता के रक्त से नहाती रही है, सभ्यताओं का विध्वंश करती और पूरे-पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही है। यदि ये वीभत्स दानवाताएं न होती तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता।

अब उनका अंत समय आआ गया है और मैं आंतरिक रूप से आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घंटाध्वनि हुई है, वह समस्त धर्माधता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होने वाले सभी उत्पीड़नों का तथा एक ही लक्ष्य की ओर  अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्परिक कटुताओं का मृत्युनिनाद सिद्ध हो। 

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चरित्र-चित्रण-

जिज्ञासु, प्रखर बुद्धि, दयालु, तार्किक मन और सोच-विचार, निर्भीकता, धार्मिक-प्रकृति, मुहफट, चरित्रवान, सत्यवादी और सज्जन । स्वामी विवेकानंद के अंदर इतने सारे गुण विद्यमान थे।

विवेकानंद के अनमोल विचार-

  • किसी मनुष्य के प्राण बचाना सबसे बड़ा धर्म है।
  • जब व्यक्ति कुछ करना चाहता है तो उसकी लगन और परिश्रम से अच्छे परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं।
  • समाज में कुछ ऐसे लोग भी पाए जाते हैं,  जो अज्ञान के कारण किसी भी बात का बतंगण बना देते हैं।
  • शिक्षित युवा स्वतंत्र निर्णय लेने वाले होते हैं।
  • जीव पर दया नहीं, बल्कि शिवज्ञान से जीव की सेवा करों।   
  • अभी और भी बहुत सारे हैं लेकिन ज्यादा होने के कारण वो आपको दूसरे ब्लॉग पोस्ट में मिलेंगे।  

स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखी गई कविता-

जागो फिर एक बार

जागो फिर एक बार!
यह तो केवल निद्रा थी,
मृत्यु नहीं थी।
नवजीवन पाने के लिए ,
कमलनयनों के विराम के लिए,
उन्मुक्त साक्षात्कार के लिए,
एक बार फिर जागो!
आकुल विश्व तुम्हें निहार रहा है,
हे सत्य! तुम अमर हो।
तेरा घर छूट गया,
जहां प्यार भरे हृदयों ने तुम्हारा पोषण किया!
और सुख से तुम्हारा विकास देखा ।
किन्तु भाग्य प्रबल है,
यही नियम है।
सभी वस्तुएं उद्गम को लौटती हैं,
जहां से निकली थी;
और नवशक्ति लेकर,
फिर निकल पड़ती हैं।
स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखी गई कविता

FAQ

स्वामी विवेकानंद कौन थे?

स्वामी विवेकानंद भारत के ही नहीं बल्कि विश्व के आध्यात्मिक गुरु या नेता और समाज सुधारक थे।

स्वामी विवेकानंद का जन्म कब हुआ था?

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी, 1863 को कोलकाता में हुआ था।

स्वामी विवेकानंद के गुरु का क्या नाम था?

स्वामी विवेकानंद के गुरु का नाम रामकृष्ण परमहंस, जो माता काली के परम भक्त थे।

स्वामी विवेकानन्द ने शिकागों में भाषण कब दिया दिया था?

स्वामी विवेकानंद ने शिकागो शहर में अपना पहला भाषण 18 सितंबर, 1893 को विश्व धर्म सम्मेलन में दिया था। 

स्वामी विवेकानंद को अमेरिका जाने में किसने मदद की थी?    

स्वामी विवेकानंद को विश्व धर्म सम्मेलन में अमेरिका जाने के लिए खेतड़ी नरेश राजा अजित सिंह ने मदद की थी।

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