Ram Prasad Bismil

Ram Prasad Bismil: Book Review, Autobiography in Hindi, pdf download

इस ब्लॉग पोस्ट में हम आपसे Ram Prasad Bismil द्वारा लिखी गई Autobiography of Bismil की book review को हिन्दी भाषा के साथ-साथ pdf download भी साझा करेंगे।

Ram Prasad Bismil: Book Review

“बिस्मिल की आत्मकथा” autobiography of Bismil का हिन्दी अनुवाद है। जिसे Ram Prasad Bismil ने ही लिखा है। और आज के समय में इसे हिन्दी भाषा के साथ-साथ एक नए लुक में प्रकाशित करने के लिए प्रकाश बुक्स ने फिंगर प्रिन्ट पब्लिकेशन को बहुत बड़ा योगदान दिया है। जिसके माध्यम से आज हम सब इस महान क्रांतिकारी की अनुभव, सूझ-बुझ, छात्रों के लिए संदेश और अपने देश के लिए कीए जाने वाले त्याग को जान सकते हैं।

इस किताब के माध्यम से Ram Prasad Bismil सिर्फ अपने बारे में ही नहीं अपने को प्रभावित करने वाले उनके गुरु सोमदत्त, चंद्रशेखर आज़ाद और बिस्मिल को सबसे ज़्यादा अपना छाप छोड़ने वाले असफ़ाक उल्ला खान का भी जिक्र हैं।

ऐसा नहीं है कि Ram Prasad Bismil युवा होने के बाद किसी क्रांतिकारी की मार्गदर्शन में आकर भारत की स्वतंत्रता में आ गए। बल्कि बिस्मिल बचपन से ही क्रांतिकारी थे। ये अलग बात है कि बचपन में लोग उन्हे नजरअंदाज कर देते थे। लेकिन युवा होने के बाद तो अंग्रेजों ने न जाने का कितने बटालियन लगा दिए आपको पकड़ने के लिए फिर भी उन्हे निराश होना पड़ता था।

वो तो किसी अपने ने धोखा दे दिया और पकड़ लिए गए, आपको फिर भी कई बार जेल से भागने का मौका मिला लेकिन आपने किसी को धोखा नहीं दिया। आप दुसरो के प्रति अपने विश्वास को बनाए रखा । अंततः फांसी के लिए स्थान गोरखपुर जैल और तारीख 19 दिसंबर, 1927 रखा गया।

आज के समय में भी अगर कहीं आपको सच्चे देशभक्त देखने को मिल जाए तो आप उनमें Ram Prasad Bismil की आत्म छवि देख सकते हैं। क्योंकि बिस्मिल की यही अंतिम इच्छा थी कि अगर मैं मरूँ और दूसरा जन्म लू, तो जन्म-धरती भारत की ही हो। मैं निरंतर भारत की ही जन्म धरती पर जन्म लेता रहूँ और अपना जान इस धरती के लिए हमेशा न्योछावर करता रहूं।    

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Ram Prasad Bismil: Autobiography in Hindi

अपने पाठकों को एक बहुत ही एक साधारण तरीके से बताने के लिए मैने फिंगरप्रिंट द्वारा प्रकाशित बिस्मिल की आत्मकथा के फार्मेट का इस्तेमाल किया है।

आत्म चरित्र-

आज के ग्वालियर राज्य में चम्बल नदी के किनारे तोमरधार नाम का ग्राम है। यहीं के एक प्रसिद्ध वंश में मेरे दादाजी  श्री नारायनलालजी का जन्म हुआ था। वे घर की कलह और अपनी भाभी के असहनीय दुर्व्यवहार के कारण मजबूर हो अपनी जन्मभूमि छोड़कर इधर-उधर भटकते रहे। अंत में अपनी धर्मपत्नी और दो पुत्रों के साथ वे आज के समय उत्तर-प्रदेश के शाहजहाँपुर पहुंचे। उनके इन्ही दो पुत्रों में ज्येष्ठ पुत्र श्री मुरलीधर जी मेरे पिता हैं।

अपना जीवन यापन करने के लिए अनेक प्रयत्न करने के पश्चात शाहजहांपुरमें एक अत्तार महोदय की दुकान पर दादाजी तीन रुपये मासिक की नौकरी करने लगे। इतनेकम रुपये में चार लोगों का भरण-पोषण होने में दिक्कत होती थी, जिसके वजह से दादा और दादी कभी-कभार भेकहे पेट हो सो जाया करते थे।

चार-पाँच वर्ष बाद जब लोग मेरे दादा जी और दादी को जान गए तब जाके कुछ राहत मिली क्योंकि दादी को भी किसी न किसी के घर काम मिल जाता था। और ब्राम्हण परिवार होने के वजह से कुछ दान वगैरह भी मिल जाया करते थे।Ram Prasad Bismil

कुछ लोगों की मदद से पिता जी को पास ही के किसी पाठशाला में शिक्षा के लिए दाखिला मिल गया। और दादाजी ने थोड़ी और मेहनत की, जिसके वजह से सैलरी में कुछ इजाफा हो गया। और घर-बार थोड़ा सुधरने लगा। कुछ साल गुजरने तक पिताजी कुछ शिक्षा पा गए और दादाजी ने एक मकान खरीद लिया। और दादाजी को पिताजी का विवाह करने का विचार आया।

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पिताजी का गृहस्थ जीवन

विवाह हो जाने के पश्चात पिताजी म्यूनिसिपैलिटी में पंद्रह रुपये मासिक वेतन पर नौकरी पकड़ ली। दो साल बाद ही उन्होंने स्वतंत्र व्यवसाय आरंभ करने का प्रयत्न किया और कचहरी में सरकारी स्टाम्प बेचने लगे। अच्छी खासी इनकम होने पर घर-गृहस्थी एक समान पटरी पर चलने लगी।

कुछ सालों बाद एक पुत्र ने जन्म लिया लेकिन व बच न सका। फिर मेरा(बिस्मिल) आगमन ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष11, संवत् 1954 विक्रमी को हुआ। बड़े प्रयत्नों से मानता मनकर अनेक गंडे, ताबीज तथा कवचों द्वारा श्री दादाजी ने इस शरीर की रक्षा के लिए प्रयत्न किया जो सफल भी हुआ।

मेरे बाद पाँच बहनों और तीन भाइयों का जन्म हुआ लेकिन उनमें से दो भाई और भहनों ने ज्यादा साथ न दिया और चले गए। बाल्यकाल से ही दादाजी मेरे शारीरिक शिक्षा पर और पिता जी केवल शिक्षा पर ध्यान देते थे। यदि पिताजी कुछ पूंछें और मैं बताने में असफल रहा तो बड़ी मार पड़ती थी और मुझे कुछ दिन तक हल्दी-दूध पीना पड़ता था। 

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मेरी कुमारावस्था-

मेरी शिक्षा हिन्दी और उर्दू दोनों माध्यम से दी जाती थी। जब मैं उर्दू का चौथा दर्जा पास करके पांचवें में आया तो उस समय मेरी अवस्था लगभग चौदह वर्ष की होंगी। इसी बीच मुझे पिताजी सन्दुक से रुपये पैसे चुराने की आदत पद गई थी। इन पैसों सेमैं उपन्यास खरीदकर खूब पढ़ता। लेकिन पिताजी जी के जानने के बाद मैं चोरी-छिपे पढ़ने लगा। मैं सिगरेट्स और भांग का भी सेवन करने लगा था।

कुछ दिनों बाद जब मेरी चोरी पकड़ी गई, पिताजी का दो-चार हाथ गिरा, सन्दुक में ताला मारा जाने लगा पर मैं अब माँ के संदूकों पर हाथ साफ करता था। कुछ दिनों बाद जब मेरे बाजू वाले मकान में एक आर्य समाजी पंडित जी अखिलानंद पधारे। गांव-मुहल्ले में उनकी व्याख्या सुनने का असर ऐसा हुआ कि मेरे कुकर्म दूर होने लगे।

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मेरे गुरुदेव-

मैं पढ़ने में बड़ा प्रयत्न करता था और अपने दर्जे में प्रथम आता था। यह अवस्था आठवें दर्जे तक रही। जब मैं आठवें दर्जे में था, उसी समय एक दूसरे सवामी श्री सोमदेवजी सरस्वती आर्य समाज, शाहजहांपुर में पधारे। उनका मुख्य नाम श्रीयुत ब्रजलाल चोपड़ा था। उनके व्याख्यान से प्रभावित होकर कुछ सज्जनों ने शाहजहांपुर की आर्य समाज मंदिर में प्रस्ताव रखा, जिसको उन्होंने स्वीकार किया।

मैं स्वामीजी के पास आया-जाया करता था। स्वामीजी मुझे धार्मिक तथा राजनीतिक उपदेश देते थे। और इसी प्रकार की पुस्तकें पढ़ने का भी आदेश करते थे। राजनीति में भी आपका ज्ञान उच्च कोटि का था। लेकिन आप मुझसे इस बारे में कोई चर्चा नहीं करते थे।

यद्यपि आप आर्य समाज के सिद्धांतों को सर्वप्रथम मानते थे, किन्तु परमहंस रामकृष्ण, स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ महात्मा कबीरदास के उपदेशों का वर्णन प्रायः किया करते थे। धार्मिक तथा आत्मिक जीवन में जो दृढ़ता मुझमें उत्पन्न हुई, वह स्वामीजी महाराज के सदुपदेशों का ही परिणाम है। आपकी दया से ही मैं ब्रम्हचर्य-पालन में सफल हुआ।

आपने मेरे भविष्य-जीवन के संबंध में जो-जो बातें कहीं थी, अक्षरशः सत्य हुई।Ram Prasad Bismil

उनकी कुछ तवीयत भी खराब रहती थी, जिसके लिए मैं उनकी थोड़ी-बहुत सेवा किया करता था। लेकिन फिर भी कोई लाभ नहीं हुआ और उनका शरीर दिन-प्रतिदिन ढलता गया। बाद में पता चला कि उनकी आतें सद चुकि थी। फिर ऑपरेशन भी हुआ लेकिन कोई सुधार देखने को न मिला।  और सोमदत्त जी को अपना नश्वर शरीर त्यागना पड़ा।

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स्वदेश प्रेम-

गुरु जी के जाने के बाद मैने अंग्रेजी के नवें दर्जे में आया, कुछ स्वदेश संबंधी पुस्तकों का अवलोकन प्रारंभ हुआ। शाहजहांपुर में सेवासमिति की नींव पंडित श्रीराम वाजपेयी ने डाली, उसमें भी बड़े उत्साह से कार्य किया। दूसरों की सेवा का भाव हृदय में उदय हुआ। अब कुछ समझ में आने लगा कि वास्तव में देशवासी बड़े दुखी हैं। कॉलेज की स्वतंत्र वायु में हृदय में भी स्वदेश के भाव उत्पन्न हुए उसी साल लखनऊ में अखिल भरतवर्षीय कॉंग्रेस के सम्मेलन का उत्सव उत्साहपूर्वक आयोजित किया गया।

जिसके मुख्य अतिथि बाल गंगाधर तिलक थे, लोगों ने उनके स्वागत अपने आप को उनके पैरों के नीचे बिछा दिया, ताकि उनके कदम नीचे न पड़े। लोग उनके कदमों के नीचे पड़े धूल को अपने सर माथे लगाते थे। नहीं तो रुमाल में बांध कर अपने घर ले जाते थे।Ram Prasad Bismil

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रेलवे डकैती(काकोरी कांड)

इसके पहले मैने बहुत से कांड कर चुके थे, जैसे पिस्तौल खरीदना, बेचना, किसी गावं के अत्याचार मुखिया या कोई अत्याचारी ब्राम्हण या ठाकुर और अंग्रेजों के घर डकैती डालना इसमें मैने महारत हासिल कर चुका था। मेरी तलास हमेशा किसी न किसी अंग्रेज को रहती थी। लेकिन कभी हाथ न लगा। मेरे ही कुछ साथियों द्वारा मेरे साथ विश्वासघात किया गय, जान से मारने के भी प्रयत्न कीए गए लेकिन मैं बचता गया।

मेरे द्वारा दी की जाने वाली लूट-पाट में कोई आम जनता का घर नहीं होता था बल्कि उनके उद्धार के लिए किया जाता था। अंग्रेजों के द्वारा खड़ी की जाने वाली पार्टियों के नाम की जाती थी, जिससे उन्हे हथियार या कुछ खर्चा-बर्चा निकल जाता था।

लेकिन कारोकी कांड उन सभी डकैतियों में सबसे बड़ा था। दस लोगों की एक छोटे से दल ने लखनऊ जाने वाले ट्रेन गार्ड के पास रखे एक छोटे से सन्दुक में रखे हजारों-लाखों रुपये लूट लिए, जिसमें एक साधारण आदमी की हत्या भी हो गई।

उन सभी पैसों को देशभर में चल रहे क्रांतिकारी संगठनों को बाँट दिए गए, जिन्हे लेकर सबने एक-से-एक हथियार खरीदे गए। लेकिन अंग्रेजों को यह डकैती रास नहीं आई और बड़ा ही तेजी से छान-बिन, धड़-पकड़ होने लगा। जिसे लेकर दल में मतभेद पैदा हो गया। मेरे लिडरशिप में दल समझ तो जाते थे लेकिन यह टिकाऊ नहीं होता था।

गिरफ्तारियाँ शुरू हुई और बहुत से क्रांतिकारी पकड़े गए, जिनमें अशफ़ाक उल्ला खान और मैं भी शामिल था। कुल तिस लोग गिरफ्तार हुए, जिनमें कुछ को छोड़ दिया गया, कुछ को आजीवन कारावास हुआ और कुछ को फाँसीं की सजा मुकर्रर की गई। जिनमें अशफ़ाक और मैं शामिल थे।Ram Prasad Bismil

पहले अशफ़ाक को फाँसीं दी गई और फिर मुझे 17 नवंबर, 1927 सोमवार को गोरखपुर जैल फाँसीं के तख्ते से लटका दिया गया।Ram Prasad Bismil

हालांकि मुझे दो बार जैल से भाग निकलने का मौका मिला लेकिन मैं आपने गार्ड के विश्वास के कारण भाग न सका, क्योंकि वह बुजुर्ग था, दूसरे उसकी रिटायर्ड को कुछ ही दिन शेष बचे थे और वह बाल-बच्चों वाला आदमी था। जिसे नौकरी से तो निकाला ही जाता, पेंशन भी बंद हो जाती और उसे जैल भी संभवतः होती। क्योंकि मैं निकलने के बाद अंग्रेजों को बहुत सारा हरजाना भरना पड़ता।   

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कुछ अच्छे और महत्वपूर्ण अंश-

देशवासी काकोरी षड्यंत्र के अभियोग से शिक्षा प्राप्त कर लें। इस अभियोग में सब प्रकार के उदाहरण मौजूद हैं। प्रिवी काउंसिल में अपील दाखिल कराने का एक विशेष अर्थ यह भी था कि मैं कुछ समय तक फांसी की तारीख टलवा कर यह परीक्षा करना चाहता था कि नवयुवकों में कितना दम है और देशवासी कितनी सहायता दे सकते हैं इससे मुझे बड़ी निराशा हुई।

अंत में मैंने निश्चय किया था कि यदि हो सके तो जेल से निकल भागूँ। ऐसा हो जाने से सरकार को अन्य तीन फांसी वालों की सजा माफ कर देनी पड़ेगी और यदि ना करते तो मैं करा लेता। मैंने जेल से भागने के अनेक प्रयत्न कीए,  किन्तु  बाहर कोई सहायता न मिल सकी।

यही तो हृदय को आघात लगता है कि जिस देश में मैने इतना बड़ा क्रांतिकारी आंदोलन तथा षड्यंत्रकारी दल खड़ा खड़ा किया था, वहां से मुझे प्राण-रक्षा के लिए एक रिवाल्वर तक न मिल सका! एक नवयुवक भी सहायता को न आ सका! अंत में फांसी को पा रहा हूँ।Ram Prasad Bismil

फांसी पाने का मुझे कोई शौक नहीं, क्योंकि मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि परमात्मा को यही मंजूर था, मगर मैं नवयुवकों से फिर विनम्र निवेदन करता हूं कि जब तक भारत वासियों की अधिक संख्या सुरक्षित ना हो जाए, जब तक उन्हें कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान ना हो जाए, तब तक वह भूलकर भी किसी प्रकार के क्रांतिकारी षड्यंत्रों में भाग न लें।

यदि देश सेवा की इच्छा हो तो नवयुवक खुले आंदोलनों द्वारा यथाशक्ति कार्य करें, अन्यथा उनका बलिदान उपयोगी न होगा। दूसरे प्रकार से इससे अधिक देश सेवा हो सकती है, जो ज्यादा उपयोगी सिद्ध होगी। परिस्थिति अनुकूल न होने से ऐसे आंदोलनों में परिश्रम प्रायः व्यर्थ जाता है। जिसकी भलाई के लिए करो, वही बुरे-बुरे नाम धरते हैं और अंत में मन-ही-मन कुढ़कर प्राण त्यागने पड़ते हैं।

FAQ

Q पंडित राम प्रसाद बिस्मिल कौन थे?

Pandit Ram Prasad Bismil एक भारतीय क्रांतिकारी, लेखक, कवि और अपने दल के मशहूर शायर थे।

Q राम प्रसाद बिस्मिल के माता-पिता का क्या नाम था?

Ram Prasad Bismil के माता का नाम मूलमाती देवी तथा पिता का नाम पंडित मुरलीधर था।

Q राम प्रसाद बिस्मिल के दादा-दादी का क्या नाम था?

Ram Prasad Bismil के दादाजी का नाम श्री नारायनलालजी और दादी का नाम “अज्ञात”(नहीं मालूम है) है।

Q राम प्रसाद बिस्मिल के गुरु का नाम क्या था

Ram Prasad Bismil के के गुरु का नाम श्रीयुत सोमदत्त जी जिनका पूरा नाम ब्रजलाल चोपड़ा था।

Q राम प्रसाद बिस्मिल को कब और फांसी कहां दी गई?

Ram Prasad Bismil और उनके साथियों को गोरखपुर जेल में 19 दिसंबर, 1927 को फांसी दी गई।

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