Autobiography Of a Yogi in Hindi Book

Perfect Autobiography Of a Yogi in Hindi Book by Paramhans Yoganand

Perfect Autobiography Of a Yogi in Hindi Book Review And Summary by Paramhans Yoganand. यह किताब 1946 में पहली बार सबके सामने आई थी। जिसने आज तक बहुत सारे लोगों को प्रभावित कैया है।

Autobiography Of a Yogi in Hindi Book

Review of Autobiography Of a Yogi in Hindi Book by Paramhans Yoganand

“autobiography of a yogi” परमहंस योगानन्द द्वारा लिखित, एक सच्ची अध्यतामिकता की इससे बड़ी किताब और नहीं हो सकती। मैने अपने ब्लॉग “दुनिया के महान सेल्समैन” में ये कहा भी है कि पश्चिम सभ्यता के लेखक भौतिक जीवन को सुधारने में और पूर्वी सभ्यता के लेखक आध्यात्मिक जीवन को अग्रसर करने में सबसे बड़ा योगदान है। चाहे वो किसी भी पिंड के हो। हालाकि “परमहंस योगानन्द” ने इस किताब की रचना अपना कोई प्रोफेशन समझ कर नहीं वरन भारतीय संतो की परिभाषा को अन्य लोगों तक पहुचाने के लिए, खासकर पश्चिम में रह रहे लोगों के लिए लिखा है, जो अध्यात्मिकता को अपने जीवन में उतरना चाहते हैं।     

“autobiography of a yogi” के लेखक परमहंस योगनन्द ने यह किताब अपने जीवन के साथ उन सभी योगियों की गाथा को लिखा है, जिनके वजह से उनके जीवन में बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा है। चाहे  वो उनकी माता-पिता, गुरु “युकतेश्वर जी महाराज” हों या आत्म-साक्षात्कार लाहिड़ी महाशय

“autobiography of a yogi” एक साधारण मुकुंद से परमहंस योगानन्द बनने की रोचक गाथा है। जिसे सभी को जानना और समझना चाहिए, तथा अपने भौतिक जीवन से ऊपर उठ कर अध्यात्मिकता के तरफ अग्रसर होना चाहिए। जिसका एक मात्र उद्देश्य अपने भौतिक जीवन को माया नगर से मुक्त कर ईश्वर की शरण तक पहुचना है।  “autobiography of a yogi” में परमहंस योगानन्द बताते हैं कि कैसे एक साधरण मनुष्य अपने साधारण जीवन से आगे बढ़ कर अपने आध्यात्मिक गुरुओं के चमत्कारिक जीवन से प्रभावित होकर योगानन्द और फिर परमहंस की उपाधि को प्राप्त करते हैं। जिसका एक मात्र उद्देश्य यह होता है कि पश्चिम के लोगों (जो आध्यात्मिक के तरह आना चाहते हैं, जिसे मार्गदर्शन की जरूरत हैं) को अपने मार्गदर्शन से उन्हे पुनः जीवित कर सकें और जीवन-मरण से मुक्ति दिला सकें।

Summary of Autobiography Of a Yogi in Hindi Book by Paramhans Yoganand

कहानी मुकुंद से योगानन्द परमहंस बनने की है। माता ज्ञान प्रकाश घोष और पिता भगवती चरण घोष एक बंगाली क्षत्रिय होने के साथ साधु प्रकृति के थे और लाहिड़ी महाशय को अपना आध्यात्मिक गुरु मानते थे। लाहिड़ी महाशय की दया-दृष्टि इनके परिवार पर सदा बनी रही। ऐसा ही एक वाकया हुआ जब मुकुंद अभी माँ की कोख में थे और ज्ञान प्रकाश अपने गुरु से आशीर्वाद लेने गई थी। गुरु ने ज्ञान प्रकाश को बताया कि तुम्हारा लड़का होगा और वो एक योगी बनेगा, जिसका लक्ष्य पश्चिम के लोगों का मार्गदर्शन करना होगा। ज्ञान प्रकाश के गुरु के आशीर्वाद को सिरोधार्य रखते हुए चेहरे पर एक उन्मत्त लिए लौट गई।

गुरु के आशीर्वाद से  माँ ने एक तेजस्वी लड़के को उन्नीसवी शताब्दी के अंतिम दशक में जन्म दिया और नाम मुकुंद लाल घोष रखा गया। मुकुंद अपने जीवन का बाल्यकाल, आठ वर्ष गोरखपुर में बिताया। मुकुंद के जीवन में पहली घटना घटी जो अध्यात्मिकता के तरफ पूरा मोड़ दिया। हुआ ये कि मुकुंद का अपने पुश्तैनी निवास स्थान कोलकाता में रहते हुए उन्हे हैजा जैसे महामारी का सामना करना पड़ा। माँ ज्ञान प्रकाश ने अपने गुरु लाहिड़ी महाशय का आशीर्वाद मांगा और एक तेज प्रकाश ने बिस्तर पर पड़े मुकुंद को चारों तरफ से घेर लिया, मुकुंद उसी क्षण बिल्कुल स्वस्थ हो गए और बीमारी ने अपना जंजीर तोड़ दिया। मुकुंद अपनी माँ की इस श्रद्धा और विश्वाश को देख कर घर में पड़े लाहिड़ी महाशय के चित्र को निहारने लगे।

एक रोज मुकुंद सुबह उठने के बाद अपने बिस्तर पर बैठे, आंखे बंद किये उस घने अंधकार को जानने की चेष्टा कर रहे थे कि उसी क्षण अंतरदृष्टि के सामने तेज प्रकाश प्रज्वलित हुआ। ललाट के दीप्तिमान पट में पर्वत गुफाओं में ध्यानलिन अवस्था में बैठे हुए साधु-संतों की आकृतियाँ एक चलचित्र की भाँति दिखने लगी। मुकुंद ने उनसे परिचय पूछा और जवाब आया कि हम हिमालय निवासी साधु है। ऐसे आकाशीय जवाब को सुनकर उनका मन गदगद हो गया। मुकुंद ने आगे कहा मैं भी हिमालय की इच्छा रखता हूँ, अप जैसा बनना चाहता हूँ, जिसके बाद चमत्कारिक दृश्य गायब हो गया लेकिन रजत किरणे फैलने लगी। जिसे देखकर मुकुंद ने एक और सवाल पूछा कि ये अद्भुत प्रकाश क्या है? जवाब आया, मैं ईश्वर हूँ, मैं प्रकाश हूँ। मुकुद ने कहा, मैं भी आपके साथ एकाकार होना चाहता हूँ, जिसके बाद प्रकाश धीरे-2 विलुप्त होता गया, लेकिन मुकुंद को ब्राम्ह की स्थाई खोज की विरासत प्राप्त हो चुकी थी।

मुकुंद का ध्यान लाहिड़ी महाशय के ऐसे चमत्कार से, ऐसा प्रकाश हुआ कि कुछ ही दिनों बाद दिखने लगा। एक बार छत के एक किनारे खड़े मुकुंद के पैर में एक छोटा सा घाव निकला हुआ था, जिसे देख कर बड़ी बहन उमा ने मलहम लाया और मुकुंद ने उस घाव पर लगाने के बाद अपने हाथ में भी लगा लिया। उमा ने जब पूछा कि मुकुंद ने ऐसा क्यों किया तो मुकुंद ने जवाब दिया कि कुछ दिन बाद यहाँ भी एक बड़ा सा घाव आने वाला है, जिस पर मैं पहले से ही तुम्हारे दिए हुए इस मलहम को लगाकर ये देख रहा हूँ कि वो ठीक से काम कर रहा है या नहीं। उमा  उस वक्त खिल्ली उड़ा कर चल दी। लेकिन कुछ दिन बाद मुकुंद के हाथों पर एक बड़ा घाव निकल चुका था, जिसे देख कर उमा डरती हुई ये कह कर भाग गई कि माँ मुकुंद झाड़,फुक और टोना करना सिख रहा है।

एक दिन मुकुंद अपनी बहन के पास छत परे खड़े दो पतंगों को उड़ते हुए देख रहे थे, उमा ने कहा कि क्या मुकुंद उन दोनों पतंगों को अपने पास ला सकता है? और कुछ ऐसा ही हुआ। दोनों पतंग आपस कटने के बाद उड़ते हुए सामने के छत पर नागफनी के पौधे में आकर फँस गए। जिसे मुकुंद आसानी से ले सकते थे। उमा उनके इस घटना से काफी प्रभावित हुई।              

ऐसे ही मुकुंद के सामने बहुत सारी घटनाएँ घटी, और अपने सच्चे गुरु की खोज में निकले मुकुंद को बहुत सारें आत्मसाक्षात्कार और चमत्कारिक संतों (दो शरीरों वाले संत, सुगंधित बाबा, बाघ स्वामी, निद्राविहीन संत) से आशीर्वाद मिलता चला गया। आखिरकार एक दिन मुकुंद को बनारस की गलियों में अपने गुरु युकतेश्वर जी से साक्षात्कार हो गई। और युकतेश्वर जी ने मुकुंद को अपने शरणों में जगह दिया। जिसमें मुकुंद अपने गुरु से योग क्रिया का ज्ञान पाकर निरंतर आगे बढ़ते चले गए और अपने आस-पास लोगों को बहुत प्रभावित किया। मुकुंद ने अपने गुरु युकतेश्वर के आशीर्वाद से रांची मे एक स्कूल खोला, जिसमें अन्य जाति और समाज से उठकर लड़कों को जागृत करना था। अपने गुरु द्वारा शिक्षा, उपदेश और “योगानन्द” की उपाधि लेकर को पश्चिमी लोगों को अध्यात्मिकता से जोड़ने के लिए अमेरिका जाना पड़ा। अमेरिकी लोग योगानन्द से मिलकर बहुत प्रभावित हुए और योगानन्द ने उन्हे क्रिया योग की शिक्षा दी और लोगों को बताया कि उन्हे अपने भौतिक जीवन को त्याग कर आध्यात्मिक जीवन को अपनाना चाहिए।

युकतेश्वरजी के बुलावा भेजने पर योगानन्द 15 साल बाद भारत वापस आते हैं और गुरु युकतेश्वरजी महाराज सामाधि लेने से पहले उन्हे “परमहंस” की उपाधि देते है, जिससे उन्हे एक नया जीवन और नया पहचान मिलता है। युकतेश्वर जी की समाधि लेने के बाद एक दिन युकतेश्वर जी साक्षात अपने दोबारा हाड़-मांस के रूप मे प्रकट होकर भौतिक शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर के बारे में बताते हैं। कुछ और दिन भारत में बिताने के बाद मुकुंद से परमहंस योगानन्द बनकर गुरुदेव के उद्देश्यों को पश्चिम में बाटने के लिए फिर से चल पड़ते हैं।

कुछ महत्वपूर्ण अंश Autobiography Of a Yogi in Hindi Book-

  • योगी कुंजी की योग्यता कभी कम नहीं होगी , चाहे उसका मार्गदर्शन करने के लिए मैं इस भौतिक शरीर में रहूं या ना रहूं।  इस तकनीकी को बांधकर या लपेटकर किसी पुस्तक की तरह कहीं रखा नहीं जा सकता। क्रिया द्वारा अपने मुक्ति के पथ पर चलते रहो , क्रिया की शक्ति उसके अभ्यास करने में है। मैं स्वयं भी क्रिया को मानव के अभी तक अनंत ईश्वर की खोज की दिशा में किए गए प्रयासों को सबसे प्रभावशाली मानता हूं।
  • लाहिड़ी महाशय जिन्होंने अपने शरीरों को चमत्कारी ढंग से स्वस्थ किया उनके शरीर को भी अंततः चिताग्नि की ज्वाला भी बनना पड़ा , लेकिन लोगों के अंतर में जिस प्रकार की आध्यात्मिकता उनके जागृत की , ईसा मसीह के समान जिस प्रकार के शिष्य तैयार किए वहीं आज उनके अजर -अमर चमत्कार हैं।
  • आत्म परीक्षण और विचारों पर लगातार अपना ध्यान बनाए रखना ,एक अत्यंत कठोर और हिला देने वाला अनुभव है।  यह मजबूत से मजबूत अहंकार को भी चूर -चूर कर देता है ,लेकिन सच में सच्चा आत्म विश्लेषण, गणित के नियम की तरह एक सिद्ध पुरुष को पैदा करता है।  स्वयं के विचारों से प्रेम व्यक्तिगत मान्यताएं, एक अहंकारी को बनाती हैं, जो ईश्वर और सृष्टि की अपने तरीके से व्याख्या करना अधिकार समझते हैं।
  • जब तक मनुष्य अपने को इस प्रकार के दिखावे से मुक्त नहीं कर पाता, वह किसी शाश्वत सत्य को नहीं समझ सकता।  सदियों से कीचड़ सना मानव मन असंख्य सांसारिक भ्रमों से भरपूर है।  युद्ध क्षेत्र की भीषण लड़ाई यहां फीकी पड़ जाती है।
  • प्राचीन ऋषियों ने आध्यात्मिक जीवन शैली के अमिट आदर्श स्थापित किए थे ,उनके महान उद्देश्य आज के समय और देश के लिए काफी है । न ज्यादा पुरानी शैली के और ना ही ज्यादा आधुनिक भौतिकवाद वाले।  अनुशासन के नियम आज भी भारत पर लागू होते हैं । लज्जित पंडितगण जितनी काल की गणना कर सकते हैं, उससे कहीं अधिक काल से, शहरों से संसयशील समय ने वेदों की योग्यता की पुष्टि की है।
  • मानव की विभिन्न इंद्रियों द्वारा जो उन्हें स्पर्श, रस, रूप, गंध और शब्द को, जो विविध अनुभव होता है, वह इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन की संवेदनात्मक विविधता से होता है इनको लाइफ ट्रांस नियंत्रित करते हैं। यह प्राण तत्व आणविक ऊर्जा से भी सूक्ष्म होते हैं और पांच विशिष्ट संवेदी तंत्रिकाओं से युक्त होते हैं।
  • उनके कई शिष्य भादुड़ी  महाशय के बगल में रखी खड़ाऊ पर रुपए चढ़ाते, जब योग मुद्रा में ध्यानरत होते। यह आदरणीय प्रणामी भारत में प्रचलित है।  इसका अर्थ होता है कि शिष्य अपनी भौतिक संपदा को गुरु के चरणों में अर्पित कर रहा है और कृतज्ञ मित्र की तरह ईश्वर उनकी सहायता करते हैं।
  • जे. सी.  बोस सबसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने वायरलेस कोहरर और विद्युत तरंगों की अपवर्तन वक्रता को दिखाने वाले यंत्र का आविष्कार किया था, लेकिन भारतीय वैज्ञानिक ने इसका व्यवसायिक प्रचार नहीं किया। उन्होंने शीघ्र ही अपना ध्यान अजैविक से जैविक जगत पर मोड़ दिया। वनस्पति शास्त्र में उनके द्वारा किए गए क्रांतिकारी अविष्कार और भौतिक वैज्ञानिक के रूप में किए गए मौलिक अधिकारों से कहीं अधिक है।
  • सन्यास धर्म एक बार सन्यास ग्रहण करने के बाद सांसारिक बंधनों को बनाए रखने की अनुमति नहीं देता है।  वह परिवार के किसी संस्कार विधि में, जो कि एक गृहस्थ के लिए अनिवार्य माना जाता है, उस में भाग नहीं ले सकते हैं । फिर भी शंकराचार्य जोकि सन्यास कर्म के निर्माता थे, उन्होंने भी इस नियम की उपेक्षा की थी। अपनी मां की मृत्यु पर उन्होंने हाथ उठाकर अग्नि को आह्वान किया और उसमें प्रकट दिव्य अग्निशिखा से अपनी मां का दाह संस्कार किया था।
  • इतिहास में 16वीं शताब्दी के मुगल शहंशाह अकबर के दरबार में मियां तानसेन एक संगीतज्ञ थे, उनकी अद्भुत शक्तियों का वर्णन है । एक बार उनके शहंशाह  ने उन्हें एक रात्रि राग को गाने का आदेश दिया है जबकि उस समय दिन का वक्त था तानसेन ने मंत्र के साथ राग गाया और उसी क्षण पूरे राजमहल में अंधेरा छा गया।
  • भारतीय संगीत स्वर सप्तक को 22 रूपों में बांटा गया है,इन्हें अर्द्ध स्वर भी कहते हैं।  स्वर के इन सूक्ष्म अंतराल के कारण ही संगीत की अभिव्यक्ति में छोटे-छोटे भेद संभव हो पाते हैं ,जिन्हें पाश्चात्य संगीत के बाहर बूटियों के स्वर क्रम में नहीं पाया जा सकता है।

कोट्स Autobiography Of a Yogi in Hindi Book-

  • यदि मनुष्य केवल एक शरीर होता तो निश्चित रूप से उनके शरीर के साथ उनका अस्तित्व समाप्त हो जाता।
  • जिस व्यक्ति ने संभव बना लिया हो, वह न तो किसी लाभ से प्रसन्न होता है और ना ही किसी हानि से दुखी।
  • ईश्वर के उपस्थिति को अपने ध्यान द्वारा उसके साथ साथ उस आनंद को महसूस किया जा सकता है।
  • इस ब्रह्मांड में हर वस्तु की अपनी ऋतु और हर कारण का एक उद्देश्य होता है ।
  • ईश्वर सरल है उसके अलावा सब कुछ जटिल है।
  • केवल तुच्छ व्यक्ति ही दूसरे के दुख के प्रति संवेदनहीन होता है, क्योंकि वह अपने ही संकीर्ण दुखों में डूबा रहता है।
  • आपत्तियों के आघात से कभी विचलित नहीं होना चाहिए।
  • मन ही शरीर की मांसपेशियों को नियंत्रित करता है।
  • उच्च सफलता पाने के लिए कठोर सटीकता की आवश्यकता है।
  • हल्का सा अवरोध संवेदनशील उत्तरों के लिए बाधा उत्पन्न करता है।
  • साधारण प्रेम स्वार्थी होता है उसके अंदर इच्छाएं और संतोष गहराई तक होते हैं।
  • डर का सामना करो, वह डराना बंद कर देगा।
  • मोह का मायाजाल मनुष्य को किसी भी प्रकार के प्रलोभन में फंसने नहीं देता, वह इच्छित वस्तु को ही पाना चाहता है।
  • फिजूलखर्ची अशांति लाती है।
  • उथले व्यक्तियों में छोटी-छोटी विचार रूपी मछलियां बहुत हलचल मचा देती हैं।
  • जो अपने ज्ञान को छिपा नहीं सकता, वह मूर्ख है।
  • मानव चरित्र पर तब तक भरोसा नहीं होता, जब तक वह ईश्वर की शरण में नहीं जाता।
  • ज्ञान ही सबसे ज्यादा परिष्कृत करने वाला है।
  • बीमारी के अस्तित्व को बीमार होने के बावजूद स्वीकार मत करो, उपेक्षित अतिथि स्वतः ही भाग जाएगा।
  • मनुष्य का अहंकार ,जो उसमें कूट-कूट कर भरा हुआ है, उसे केवल निष्ठुर प्रहार द्वारा ही उठाया जा सकता है।
  • सुंदर चेहरे के उत्तेजक प्रहार को अपने ऊपर मत आने दो ।
  • वासनाओं में आसक्त मनुष्य के लिए अच्छाई बुराई का भेद खत्म हो जाता है।
  • गलत इच्छाओं का अभी अंत करो; अन्यथा वे स्थूल शरीर के खत्म होने के बाद भी सूक्ष्म शरीर का पीछा नहीं छोड़ेंगे।
  • ईश्वर को पाने के लिए किसी को अपना चेहरा विकृत करने की आवश्यकता नहीं है।
  • एक भक्त में यह सोचने की प्रवृत्ति होती है कि उसके द्वारा अपनाया गया मार्ग ही ईश्वर को पाने का एकमात्र मार्ग है।
  • क्रोध केवल इच्छा के अवरोध से उत्पन्न होता है।
  • प्रतिदिन नवीन आनंद ही ईश्वर है।

चरित्र-चित्रण-Autobiography Of a Yogi in Hindi Book-

मुकुंद- लाहिड़ी महाशय के आशीर्वाद से जन्मे मुकुंद एक ओजस्वी, तेज और आध्यात्मिक से ओत-प्रोत  व्यक्ति थे। अपने गुरुओं का एक आज्ञाकारी शिष्य थे, जिसके नक्शे कदम पर चलते हुए उन्हे आध्यात्मिक का प्रकाश मिला और जिसका लक्ष्य था पश्चिम के लोगों का मार्गदर्शन करना ।

ज्ञान प्रकाश घोष –  लाहिड़ी महाशय की एक शिष्या थी। मुकुंद की माँ और भगवती चरण घोष की धर्मपत्नी। ज्ञान प्रकाश का मन हमेशा धर्म कार्यों और दान-पुण्य में लगा रहता था। मुकुंद एक साधारण इंसान से आध्यात्मिक जैसे ज्ञान के प्रकाश में प्रज्वलित हो सके तों उसमें अपनी माँ ज्ञान प्रकाश का बहुत बड़ा आशीर्वाद था। 

भगवती चरण घोष- भगवती चरण घोष भी अपनी पत्नी की तरह लाहिड़ी महाशय के शिष्य थे। भगवती चरण घोष नागपूर रेलवे के उपाध्यक्ष के समकक्ष पद पर कार्यरत थे। भगवती का आचार-विचार एक सात्विक और बहुत ही शांत था। उन्होंने कभी भी ज्ञान प्रकाश को दान-पुण्य करने से नहीं रोका। लेकिन मुकुंद को लेकर थोड़ा चिंतित रहते थे। लेकिन जब उन्हे लगा कि मुकुंद आध्यात्मिकता के लिए ही पैदा हुए हैं तो उनके निर्णयों पर कभी सवाल नहीं उठाया।

युकतेश्वर जी महाराज- युकतेश्वर जी महाराज लाहिड़ी महाशय के शिष्य और मुकुंद के गुरु थे। युकतेश्वर जी महाराज एक आध्यात्मिक गुरु थे। जिसका सामना एक कॉबरा साँप से हुआ लेकिन उन्होंने उसे सिर्फ प्रेम से पुचकारते हुए ही कुटिया के बाहर भेज दिया। युकतेश्वर जी के पास ऐसी दैवी शक्तियां थी, जो हैजा, मधुमेह मिर्गी और पक्षाघात जैसे रोगों को ठीक कर देते थे। युकतेश्वर जी को शास्त्रों की अति उटं ढंग से व्याख्या करना जानते थे, जो शिष्यों को काफी प्रभावित करते थे।

आनंदमयी माँ- आनदमयी माँ बंगाल के सुदूर गावं में  एक ऐसी तेजोमयी महिला संत थी, जिनसे मिलने के लिए मुकुंद अपने आप को रोक नहीं सके। महिला संत समाधि की उच्च अवस्था थी। जिन्होंने अपने उम्र के पचपन साल बिना खाना-पानी के सिर्फ ध्यान माध्यम से गुजार दिया। लेकिन दूसरों को खाना बनाकर खिलने में उन्हे बड़ा आनंद आता था।  

लाहिड़ी महाराज- लाहिड़ी महाशय का पहला नाम आनंद लाल बोश था। हिमालाई बाबाजी से  ज्ञान लेने के बादआनंद लाहिड़ी महाशय की पदवी प्राप्त की। लाहिड़ी महाशय हिमालय में विराजमान बाबाजी के शिष्य और युकतेश्वर महाराज के गुरु थे। लाहिड़ी महाशय की विशेषता थी कि वे किसी भी धर्म या जाति के मनुष्य को क्रिया योग उपहार में देते थे। लाहिड़ी महाशय अत्यंत सौम्य और शक्तिदायक  शब्दों में बोलते थे। 

FAQ-

Q: परमहंस योगनन्द का जन्म कब और कहाँ हुआ था।

Ans: परमहंस योगनन्द का जन्म 5 जनवरी 1893 को गोरखपुर में हुआ था।

Q: परमहंस के बचपन का पूरा नाम क्या था?

Ans: परमहंस योगानन्द के बचपन का पूरा नाम मुकुंद लाल घोष था।

Q:  मुकुंद को परमहंस योगानन्द की पदवी कब और किसने दी?

Ans: मुकुंद को युकतेश्वरजी महाराज ने अमेरिका भेजने से पहले अपने बनारस की कुटिया में योगानन्द और फिर योगनन्द को अमेरिका से आने के बाद अपने समाधि लेने से पहले परमहंस की उपाधि दी।  

Q: परमहंस योगानन्द का उद्देश क्या था? और उन्होंने कौन सी योग का साक्षात्कार किया?

Ans: परमहंस योगनन्द का उद्देश्य पश्चिम के लोगों को, जो आध्यात्मिकता की खोज में थे, उनका मार्गदर्शन करना था। योगानन्द ने क्रिया योग का साक्षात्कार किया।

Q: क्रिया योग क्या है? और इसको करने से क्या फायदा होता है? इसका सबसे पहले उपयोग किसने किया था?

Ans: क्रिया का मूल संस्कृत शब्द “क्र” है जिसका अर्थ है, करना और प्रतिक्रिया । यही मूल शब्द कर्म में भी है। प्राकृतिक नियम का कारण और प्रभाव, इस प्रकार क्रिया योग जोड़ना यानी एक विशिष्ट विधि के द्वारा स्वयं को अनंत के साथ जोड़ना।

क्रिया योग एक सरल मनोवैज्ञानिक विधि है जिसके द्वारा मानव के रक्त को कार्बन रहित बनाकर उसे ऑक्सीजन से पुनः रिचार्ज अथवा पुनः ऊर्जावान कर दिया जाता है। लाहिड़ी महाशय ने इसे अपने गुरु बाबा जी से हिमालय पर प्राप्त की थी, जिन्होंने इस तकनीकी अथवा विधि जो अंधकार युगों में खो गई थी, इसे फिर से खोजा और परिष्कृत किया।

दोस्तों के साथ साझा करे

Leave a Reply

Your email address will not be published.